Saturday, March 26, 2011

जो पत्र लिखे थे कभी तुम्हे,उनका न कोई मोल रहा
तेरे अभिमान की आंधी में,यह प्रेम वाटिका उजड़ गई!

जो मेरी माँ ने दिया मुझे,यह प्रेम भी उससे कम न था
तुम कल को ले पछताती हो,मुझको खोने क़ा ग़म न था
पर तेरा यह व्यवहार है नित,मेरे धीरज को तोल रहा
जब रुकें न आँसूं देख-देख,वह देवी माँ भी गुज़र गई

तेरे अभिमान की आंधी में,यह प्रेम वाटिका उजड़ गई!

जब बचें हैं कुछ दिन जीवन के,बस तुम ही तुम हो यादों में
उस पार अकेला पहुचूँगा,बस तुम होगी फरियादों में
तुम पहुँचोगी मंजिल पर,लेकिन मेरा पथ तो गोल रहा
अब नाव बना लो पत्रों के,वैसे भी जीवन डोल रहा

मैं सह न सका लहरों को जब,नफरत की धरा उमड़ गई
तेरे अभिमान की आंधी में,यह प्रेम वाटिका उजड़ गई!

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