Tuesday, April 5, 2011

दोस्तों बहुत दिनों के बाद एक अपने तरीके की कविता लाया हूँ!
बेहद स्वाभाविक अनुभूतियों की कविता है!
आप हरदम इसे महसूस करते होंगे!
फर्क इतना ही है...
"आप सोच रहे हैं...मैं लिख पा रहा हूँ..."

निवेदन करता हूँ....
दिन रात यही मैं सोचूं अब,
तुम दूर वहां कैसे होगे!
क्या जैसा मैंने भेजा था
अब भी बिलकुल वैसे होगे!

मैं बिलकुल यहाँ अकेली हूँ!
बस याद तुम्ही को करती हूँ!
यह सोच नहीं खेली होली,
तुम रंगों को तरसे होगे!

अब कंठ शुष्क ही रहते हैं,
औ" ह्रदय दग्ध सा रहता है
उस स्नेह-हीन मरुस्थल में
तुम निश्चय ही प्यासे होगे!

मैं विरह-वेदना सहती हूँ
शीतलता की अब चाह नहीं
तुम भी मानिंद पतंगे के
हर क्षण,हर पल झुलसे होगे!

अब अन्दर से बस घुटती हूँ,
सब वीराना-सा लगता है,
 तुम भी अपनी परवशता पर,
होकर-के क्षुब्द हँसे होगे!

अब तेरी हर तस्वीर को मैं,
सीने से लगाए रखती हूँ!
दिल कहता है तुम भी इस पल,
मुझको बाहों में कसे होगे!

दिल पागल है,इसकी छोड़ो
पर मन डर-डर के पूछे है

"क्या जैसा मैंने भेजा था
अब भी बिलकुल वैसे होगे?"