Sunday, September 25, 2011

पापा,आज मेरा बर्थडे है
सबका फ़ोन आया
सबने विश किया
पर इस बार,एक कमी खली...आपकी!
अब तक क्यों न लगा कभी ऐसा...शायद अब मैं बड़ा हो गया हूँ...

सोचा...बिलकुल बचपना के साथ...
यह जीवन तो आपका दिया हुआ है...
फिर आपकी कमी कैसे...

सोचा की जतलाऊँ अबकी बार...की मैं सोचता हूँ...
पर हिम्मत नहीं जुटा पाया...
शायद आसुओं क़ा बाँध टूट जाता...
शायद सब जान जाते की मैं कितना कमज़ोर हूँ!

पर....
अकेले में कौन देख पाता है???
जब स्वयं से साक्षात्कार होता है !
तब स्वयं को झुटला नहीं पाता...
बाँध टूट जाता है...आसुओं क़ा...

तो क्या हुआ ग़र मैं बड़ा हो गया हूँ...

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