Thursday, March 8, 2012

खेती-बाड़ी,चंचल नदियाँ
संपन्न गांव के चित्रण हैं
भारत के गांव में अब भी
बस भूख सुनाई देती है

सावन के झूले कहाँ दिखे?
गेहूं की बाली कहाँ दिखी?
पनघट पर गोरी नहीं दिखी!
गुमटी या मंडली कहाँ दिखी?

भादो आए,फगुआ आए
है कोई नहीं गाने वाला
अतृप्त आत्माओं की अब
बस हुक सुनाई देती है

भारत के गांव में अब भी
बस भूख सुनाई देती है

Sunday, September 25, 2011







कल तक बहुत हुलास था की
तुम वहाँ हो
यह सोच कर जीता था हरदम 
तुम वहाँ हो
और आसरा ही क्या था
जीने क़ा मेरे
कुछ साथ बीते पल
कुछ बोल तेरे
दिल था धड़कता सोचकर की
तुम वहाँ हो
तो क्या हुआ ग़र मैं यहाँ हूँ
तुम वहाँ हो



पर मैं ग़लत था,अब हूँ मैं
यह जान पाया
ठोकर लगी तब जाके मुझको
होश आया
अब बौखला के ढूंढता हूँ
तुम कहाँ को
चारों तरफ है जलजला पर
तुम कहाँ हो



न दूर तक हैं मेरी आखें 
देख पाती
हैं आंसुओं से पूर्ण
पलपल झिलमिलाती
जीवन क़ा मेरे अर्थ बोलो
तुम कहाँ हो
बस एक बार आवाज़ दे दो
तुम कहाँ हो



पापा,आज मेरा बर्थडे है
सबका फ़ोन आया
सबने विश किया
पर इस बार,एक कमी खली...आपकी!
अब तक क्यों न लगा कभी ऐसा...शायद अब मैं बड़ा हो गया हूँ...

सोचा...बिलकुल बचपना के साथ...
यह जीवन तो आपका दिया हुआ है...
फिर आपकी कमी कैसे...

सोचा की जतलाऊँ अबकी बार...की मैं सोचता हूँ...
पर हिम्मत नहीं जुटा पाया...
शायद आसुओं क़ा बाँध टूट जाता...
शायद सब जान जाते की मैं कितना कमज़ोर हूँ!

पर....
अकेले में कौन देख पाता है???
जब स्वयं से साक्षात्कार होता है !
तब स्वयं को झुटला नहीं पाता...
बाँध टूट जाता है...आसुओं क़ा...

तो क्या हुआ ग़र मैं बड़ा हो गया हूँ...

सुदर्शन! एक बार उतर आओ 
के अब संहार ज़रूरी है

निर्माण करो,संहार करो
अब मानव क़ा आहार करो
अब क्रोध-प्रकम्पित धरती से
मानव क़ा निस्तार ज़रूरी है

सुदर्शन! एक बार उतर आओ 
के अब संहार ज़रूरी है

अब कौन यहाँ भगीरथ है
जो गंगा लेकर आएगा?
औ' छिड़क-छिड़क कर गंगाजल
भवसागर पर लगाएगा
अब नहीं अन्य गति,श्मशान क़ा
अब विस्तार ज़रूरी है

सुदर्शन!एक बार उतर आओ
के अब संहार ज़रूरी है