जीवन की आपाधापी में ,
मैं भूल गया जीवन क्या है !
उस दीवानी ने भुला दिया ,
"इस दीवाने" का मन क्या है !
सोचा न समझा , लगा रहा
पैसा और नाम कमाने में ,
सोचा था पूछ इन्ही की बस ,
होती है आज ज़माने में !
चेतना शून्य हो जाने क़ा ,
अब और भला लक्षण क्या है ?
जीवन की आपाधापी में ,
मैं भूल गया जीवन क्या है !
है द्वंद्व यूद्ध अब छिड़ा हुआ ,
और पांचजन्य हुंकार रहा ,
इस युद्ध क़ा अश्वत्थामा भी ,
है ग़रज़-ग़रज़ चिंघाड़ रहा ,
डंके की चोट सुन-सुन भूला ,
वो "पायल की छम-छम" क्या है !
वो "लहरों क़ा कलरव" क्या है !
वो "भवरों क़ा गुंजन" क्या है !
इन बातों के हैं क्या कहने ...
ये तो कवियों की थाती हैं ...
मैं तो अब यह भी भूल चूका
हँसना क्या है ! क्रंदन क्या है !
जीवन की आपाधापी में ,
मैं भूल गया जीवन क्या है !
जब बैठा-बैठा सोचू मैं ,
कितना सुन्दर था मेरा कल !
झट से तम की चादर ओढ़े ,
छा जाता आने वाला पल ,
इन दोनों 'कल' के बीच कहीं ,
है मेरा जीवन बीत रहा ,
जो सब को चाहा खुश रखना ,
मैं खुद न अपना मीत रहा !
"जीवन क़ा बीमा " करवाया ,
पर भूल गया यौवन क्या है !
जीवन की आपाधापी में ,
मैं भूल गया जीवन क्या है !
मैं भूल गया जीवन क्या है !
उस दीवानी ने भुला दिया ,
"इस दीवाने" का मन क्या है !
सोचा न समझा , लगा रहा
चेतना शून्य हो जाने क़ा ,
अब और भला लक्षण क्या है ?
जीवन की आपाधापी में ,
मैं भूल गया जीवन क्या है !
है ग़रज़-ग़रज़ चिंघाड़ रहा ,
डंके की चोट सुन-सुन भूला ,
वो "पायल की छम-छम" क्या है !
वो "लहरों क़ा कलरव" क्या है !
वो "भवरों क़ा गुंजन" क्या है !
जीवन की आपाधापी में ,
मैं भूल गया जीवन क्या है !
इन दोनों 'कल' के बीच कहीं ,
है मेरा जीवन बीत रहा ,
जो सब को चाहा खुश रखना ,
मैं खुद न अपना मीत रहा !
"जीवन क़ा बीमा " करवाया ,
पर भूल गया यौवन क्या है !
जीवन की आपाधापी में ,
मैं भूल गया जीवन क्या है !
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