हिंदी की कविताओं क़ा जन्म श्रोताओं से ज्यादा इसके विषय से जुड़े लोगों के लिए होता है...ऐसा न हो के हम लोग कविता पढ़ें,इसके भाव और शब्द सौंदर्य की प्रशंसा करें और आगे बढें..यह कविता की हत्या है...और इससे बढ़कर सत्य की हत्या है...आशा है आप लोग भी मेरी दृष्टि से इस कविता को पढेंगे...न सिर्फ पढेंगे अपितु इसे अपने व्यावहारिक जीवन में जीने क़ा प्रयास करेंगे...
अगर ऐसा होता है तो यकीं मानिए मेरी एक कविता कई मधुशालाओं...कई राष्मिरथियों से बढ़कर होगी...
जिस धरती पर थे राम हुए ,
हनुमान,कृष्ण,बलराम हुए
हा!अब उस पर बस रावण के,
अवतार दिखाई देते हैं...
अब कहीं नहीं सच्चाई है,
ईमान,धरम क़ा क्या कहना,
मैं जित देखूं तित लालच के
विस्तार दिखाई देते हैं....
आज क़ा एक साधारण मनुष्य क्या सोचता है...????
"है परोपकार में क्या रक्खा,
अपना जीवन secure करो!
क्या हम तुमको बेरोजगार ,
बेकार दिखाई देते हैं...?"
आप जब बिहार.उत्तर प्रदेश आदि के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में जाएँगे आपको वहां मजदूरों के ठेकेदार मिलेंगे|
उन काम सस्ते दरों पे गरीब लडकों को मुहैया करना होता है...वे लोग तब तक उनसे काम करवाते हैं जब तक वह अधमरा न हो जाए ....आशा है आगे की पंक्तियों क़ा मर्म आप समझ पाएँगे...
"रामू इक गाँव क़ा छोड़ा है,
खाने को घर में थोडा है,
है रक्त-मांस क़ा पता नहीं...!
पर ठाकुर क़ा वह घोडा है..."
"अजी अठरह के लौंडे होकर ,
तुम इतना क्यूँ घबराते हो???
अभी लंगड़ी दौर करने के...
आसार दिखाई देते हैं..."
"थी बूढी अम्मा सिसक रही,
कूरे के डलिया हाथ लिए,
था चिल्लाता "मालिक! रोटी..."
छोटू बाबा को साथ लिए..
हमारे तरफ अक्सर शादी के पंडालों के पीछे गरीब बच्चे जूठा खाना बटोरने आ जमा होते हैं....उन्ही क़ा चित्र आखों में रखकर कविता पढ़ें...
बिट्टू शामियाने के पीछे,
था कौन खज़ाना ढूंढ रहा,
प्लास्टिक की चट्टी साथ लिए,
टूटे चप्पल को हाथ लिए..
जो लाज बची हो आखों में ,
तो ज़रा इन्हें तुम देख तो लो...
क्या हाथ पैर पाकर भी ये,
लाचार दिखाई देते हैं????
दिल करता है की मैं भी अब ,
इस स्वार्थ जगत में कूद परूँ,
मैं एकाकी इस अन्धकार में ,
कितने अलख जगाऊंगा...???
अंत में आप समाज के कतिपय तथाकथित भावनात्मक लोगों से मैं एक विनती करना चाहूँगा....
आओ साथी अब साथ चलें...
हाथों में डाले हाथ चलें...
जो साथ न आओगे अब तुम ...
मैं कितनी दूर जा पाउँगा...???
"तुम बिन सारे प्रयत्न मुझे ....
निस्सार दिखाई देते हैं...
मैं जित देखूं तित आंसूं के ही...
धार दिखाई देते है....
मुझे अपनी कविता पर आपकी प्रतिक्रियाओं से ज्यादा आपके एक शालीन प्रयास क़ा इंतज़ार रहेगा...
अगर ऐसा होता है तो यकीं मानिए मेरी एक कविता कई मधुशालाओं...कई राष्मिरथियों से बढ़कर होगी...
जिस धरती पर थे राम हुए ,
हनुमान,कृष्ण,बलराम हुए
हा!अब उस पर बस रावण के,
अवतार दिखाई देते हैं...
अब कहीं नहीं सच्चाई है,
ईमान,धरम क़ा क्या कहना,
मैं जित देखूं तित लालच के
विस्तार दिखाई देते हैं....
आज क़ा एक साधारण मनुष्य क्या सोचता है...????
"है परोपकार में क्या रक्खा,
अपना जीवन secure करो!
क्या हम तुमको बेरोजगार ,
बेकार दिखाई देते हैं...?"
आप जब बिहार.उत्तर प्रदेश आदि के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में जाएँगे आपको वहां मजदूरों के ठेकेदार मिलेंगे|
उन काम सस्ते दरों पे गरीब लडकों को मुहैया करना होता है...वे लोग तब तक उनसे काम करवाते हैं जब तक वह अधमरा न हो जाए ....आशा है आगे की पंक्तियों क़ा मर्म आप समझ पाएँगे...
"रामू इक गाँव क़ा छोड़ा है,
खाने को घर में थोडा है,
है रक्त-मांस क़ा पता नहीं...!
पर ठाकुर क़ा वह घोडा है..."
"अजी अठरह के लौंडे होकर ,
तुम इतना क्यूँ घबराते हो???
अभी लंगड़ी दौर करने के...
आसार दिखाई देते हैं..."
"थी बूढी अम्मा सिसक रही,
कूरे के डलिया हाथ लिए,
था चिल्लाता "मालिक! रोटी..."
छोटू बाबा को साथ लिए..
हमारे तरफ अक्सर शादी के पंडालों के पीछे गरीब बच्चे जूठा खाना बटोरने आ जमा होते हैं....उन्ही क़ा चित्र आखों में रखकर कविता पढ़ें...
बिट्टू शामियाने के पीछे,
था कौन खज़ाना ढूंढ रहा,
प्लास्टिक की चट्टी साथ लिए,
टूटे चप्पल को हाथ लिए..
जो लाज बची हो आखों में ,
तो ज़रा इन्हें तुम देख तो लो...
क्या हाथ पैर पाकर भी ये,
लाचार दिखाई देते हैं????
दिल करता है की मैं भी अब ,
इस स्वार्थ जगत में कूद परूँ,
मैं एकाकी इस अन्धकार में ,
कितने अलख जगाऊंगा...???
अंत में आप समाज के कतिपय तथाकथित भावनात्मक लोगों से मैं एक विनती करना चाहूँगा....
आओ साथी अब साथ चलें...
हाथों में डाले हाथ चलें...
जो साथ न आओगे अब तुम ...
मैं कितनी दूर जा पाउँगा...???
"तुम बिन सारे प्रयत्न मुझे ....
निस्सार दिखाई देते हैं...
मैं जित देखूं तित आंसूं के ही...
धार दिखाई देते है....
मुझे अपनी कविता पर आपकी प्रतिक्रियाओं से ज्यादा आपके एक शालीन प्रयास क़ा इंतज़ार रहेगा...
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