Saturday, February 19, 2011

प्रभु कोई ऐसी राह बताओ,जिस पर एकाकी चल पाऊँ

छोटे-छोटे हैं पाँव मेरे,
छोटी-छोटी सी आखें हैं,

छोटी-छोटी इन आखों में, 
छोटे-छोटे से सपने हैं,

निद्रा से तभी जगाना जब,सपने पूरे कर पाऊ


प्रभु कोई ऐसी राह बताओ,जिस पर एकाकी चल पाऊँ

बचपन में होश नहीं था जब,
मिटटी के खेल बहुत खेले,
वो चिर-चिर करती फुलझरियां,
वो जगमग झूलन के मेले,

अब वो दिन लौट नहीं सकते,बुद्धू मन को समझाऊँ,
 

प्रभु कोई ऐसी राह बताओ,जिस पर एकाकी चल पाऊँ

रस्ता मुश्किल है जानूं मैं,
हिम्मत से बढ़ता जाऊँगा,
मरने की बात नहीं करता,
मैं जान फ़क़त दे जाऊँगा,

मत देना साथ किसी को,जो न बोझ कहीं बन जाऊं
 

प्रभु कोई ऐसी राह बताओ,जिस पर एकाकी चल पाऊँ

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