Saturday, February 12, 2011

हल्का-हल्का मुस्काता हूँ...



जब याद वो मुझको आती है,
मेरी बाछें खिल जाती हैं,
आखों में अजब चमक होती,
जब वो यूही मिल जाती है,

उसके ख्याल में मैं अब तो,
ऐसा पागल हो जाता हूँ,
खुद में खोया रहता दिन भर,
हल्का-हल्का मुस्काता हूँ,

जगता हूँ उसके  सपनो से,
उसकी बातों में दिन कटते,
जो शाम को उससे मिल न सकूं,
तो मैं भूका सो जाता हूँ,

डर लगता है उसको कोई,
मेरी आखों में देख न ले,
जब माँ आती,तकिये में मुंह
रखके उल्टा सो जाता हूँ

ऐसा करके मुझे पता नहीं,
अब कैसा सुख मिल जाता है,
तनहा बैठा जब सोच-सोच,
खुद ही में शर्मा जाता हूँ



बच्चन के शब्दों में बोलूं,
तो वह इक शाकिबाला है,
मैं इकलौता पीनेवाला,
यह मन-मंदिर मधुशाला है,
अपनी बातों से वह मदिरा,
जब छलक-छलक छलकाती है,
मैं सुध-बुध खो,सब भूल-भाल,
बस गट-गट पीता जाता हूँ!

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