Sunday, September 25, 2011







कल तक बहुत हुलास था की
तुम वहाँ हो
यह सोच कर जीता था हरदम 
तुम वहाँ हो
और आसरा ही क्या था
जीने क़ा मेरे
कुछ साथ बीते पल
कुछ बोल तेरे
दिल था धड़कता सोचकर की
तुम वहाँ हो
तो क्या हुआ ग़र मैं यहाँ हूँ
तुम वहाँ हो



पर मैं ग़लत था,अब हूँ मैं
यह जान पाया
ठोकर लगी तब जाके मुझको
होश आया
अब बौखला के ढूंढता हूँ
तुम कहाँ को
चारों तरफ है जलजला पर
तुम कहाँ हो



न दूर तक हैं मेरी आखें 
देख पाती
हैं आंसुओं से पूर्ण
पलपल झिलमिलाती
जीवन क़ा मेरे अर्थ बोलो
तुम कहाँ हो
बस एक बार आवाज़ दे दो
तुम कहाँ हो



पापा,आज मेरा बर्थडे है
सबका फ़ोन आया
सबने विश किया
पर इस बार,एक कमी खली...आपकी!
अब तक क्यों न लगा कभी ऐसा...शायद अब मैं बड़ा हो गया हूँ...

सोचा...बिलकुल बचपना के साथ...
यह जीवन तो आपका दिया हुआ है...
फिर आपकी कमी कैसे...

सोचा की जतलाऊँ अबकी बार...की मैं सोचता हूँ...
पर हिम्मत नहीं जुटा पाया...
शायद आसुओं क़ा बाँध टूट जाता...
शायद सब जान जाते की मैं कितना कमज़ोर हूँ!

पर....
अकेले में कौन देख पाता है???
जब स्वयं से साक्षात्कार होता है !
तब स्वयं को झुटला नहीं पाता...
बाँध टूट जाता है...आसुओं क़ा...

तो क्या हुआ ग़र मैं बड़ा हो गया हूँ...

सुदर्शन! एक बार उतर आओ 
के अब संहार ज़रूरी है

निर्माण करो,संहार करो
अब मानव क़ा आहार करो
अब क्रोध-प्रकम्पित धरती से
मानव क़ा निस्तार ज़रूरी है

सुदर्शन! एक बार उतर आओ 
के अब संहार ज़रूरी है

अब कौन यहाँ भगीरथ है
जो गंगा लेकर आएगा?
औ' छिड़क-छिड़क कर गंगाजल
भवसागर पर लगाएगा
अब नहीं अन्य गति,श्मशान क़ा
अब विस्तार ज़रूरी है

सुदर्शन!एक बार उतर आओ
के अब संहार ज़रूरी है 

Tuesday, April 5, 2011

दोस्तों बहुत दिनों के बाद एक अपने तरीके की कविता लाया हूँ!
बेहद स्वाभाविक अनुभूतियों की कविता है!
आप हरदम इसे महसूस करते होंगे!
फर्क इतना ही है...
"आप सोच रहे हैं...मैं लिख पा रहा हूँ..."

निवेदन करता हूँ....
दिन रात यही मैं सोचूं अब,
तुम दूर वहां कैसे होगे!
क्या जैसा मैंने भेजा था
अब भी बिलकुल वैसे होगे!

मैं बिलकुल यहाँ अकेली हूँ!
बस याद तुम्ही को करती हूँ!
यह सोच नहीं खेली होली,
तुम रंगों को तरसे होगे!

अब कंठ शुष्क ही रहते हैं,
औ" ह्रदय दग्ध सा रहता है
उस स्नेह-हीन मरुस्थल में
तुम निश्चय ही प्यासे होगे!

मैं विरह-वेदना सहती हूँ
शीतलता की अब चाह नहीं
तुम भी मानिंद पतंगे के
हर क्षण,हर पल झुलसे होगे!

अब अन्दर से बस घुटती हूँ,
सब वीराना-सा लगता है,
 तुम भी अपनी परवशता पर,
होकर-के क्षुब्द हँसे होगे!

अब तेरी हर तस्वीर को मैं,
सीने से लगाए रखती हूँ!
दिल कहता है तुम भी इस पल,
मुझको बाहों में कसे होगे!

दिल पागल है,इसकी छोड़ो
पर मन डर-डर के पूछे है

"क्या जैसा मैंने भेजा था
अब भी बिलकुल वैसे होगे?"

Saturday, March 26, 2011

जो पत्र लिखे थे कभी तुम्हे,उनका न कोई मोल रहा
तेरे अभिमान की आंधी में,यह प्रेम वाटिका उजड़ गई!

जो मेरी माँ ने दिया मुझे,यह प्रेम भी उससे कम न था
तुम कल को ले पछताती हो,मुझको खोने क़ा ग़म न था
पर तेरा यह व्यवहार है नित,मेरे धीरज को तोल रहा
जब रुकें न आँसूं देख-देख,वह देवी माँ भी गुज़र गई

तेरे अभिमान की आंधी में,यह प्रेम वाटिका उजड़ गई!

जब बचें हैं कुछ दिन जीवन के,बस तुम ही तुम हो यादों में
उस पार अकेला पहुचूँगा,बस तुम होगी फरियादों में
तुम पहुँचोगी मंजिल पर,लेकिन मेरा पथ तो गोल रहा
अब नाव बना लो पत्रों के,वैसे भी जीवन डोल रहा

मैं सह न सका लहरों को जब,नफरत की धरा उमड़ गई
तेरे अभिमान की आंधी में,यह प्रेम वाटिका उजड़ गई!

Thursday, February 24, 2011

दोस्तों...कुछ बातें हैं जो आपसे बाँटना चाहता हूँ | हिंदी की वर्तमान स्तिथि कितनी अच्छी है,सभी जानते हैं...और हिंदी कविताओं की हालत और भी सोचनीय है |
आजकल हिंदी कविताओं क़ा दौर फिर से लौटा है ..बहुत सारे लोग हैं जो जगह जगह जाकर कविता सुनते हैं...पर वास्तविकता यही है की हिंदी की कविता बस मनोरंजन की कविता बनकर रह गई है | हमें यह नहीं भूलना चाहिए की हर कविता किसी विशेष परिस्तिथि पर लिखी जाती है| और अगर कविता क़ा दर्द लोगों तक नहीं पहुंचे तो उसका मतलब ही क्या है!

आशा करता हूँ आगे से आप जब भी किसी कवि या लेखक को पढेंगे या सुनेंगे ...मेरी बात आपके ध्यान में रहेगी और हिंदी की गरिमा क़ा आप ख्याल रखेंगे....


Saturday, February 19, 2011

प्रभु कोई ऐसी राह बताओ,जिस पर एकाकी चल पाऊँ

छोटे-छोटे हैं पाँव मेरे,
छोटी-छोटी सी आखें हैं,

छोटी-छोटी इन आखों में, 
छोटे-छोटे से सपने हैं,

निद्रा से तभी जगाना जब,सपने पूरे कर पाऊ


प्रभु कोई ऐसी राह बताओ,जिस पर एकाकी चल पाऊँ

बचपन में होश नहीं था जब,
मिटटी के खेल बहुत खेले,
वो चिर-चिर करती फुलझरियां,
वो जगमग झूलन के मेले,

अब वो दिन लौट नहीं सकते,बुद्धू मन को समझाऊँ,
 

प्रभु कोई ऐसी राह बताओ,जिस पर एकाकी चल पाऊँ

रस्ता मुश्किल है जानूं मैं,
हिम्मत से बढ़ता जाऊँगा,
मरने की बात नहीं करता,
मैं जान फ़क़त दे जाऊँगा,

मत देना साथ किसी को,जो न बोझ कहीं बन जाऊं
 

प्रभु कोई ऐसी राह बताओ,जिस पर एकाकी चल पाऊँ

Thursday, February 17, 2011

दोस्तों,ये एक बेहद साधारण कविता है जो हर प्रेम में नाखुश आदमी सोचता है...
आशा है आप सब मेरे भावों को महसूस कर पाएँगे...
कोमल शब्दों से मैंने थोडा व्यंग्य करना चाहा है...
कहीं आपकी नज़रों से छूट न जाए...

निवेदन करता हूँ...
तब शब्द नहीं मिल पाते थे,
जब भरा हुआ था भावों से,
अब रहा नहीं कुछ भी मन में,
शब्दों की गिनती क्या करना!

                                           तब बोल नहीं आवश्यक थे,
                                           आखें बातें कर लेती थीं,
                                           मन मेरे कोई ठेस लगे,
                                           तत्क्षण ही तेरा रो पड़ना!

था तुमने ही तो सिखलाया,
के "प्यार दीवाना होता है",
हम तो बस "प्यार के राही हैं",
जब"प्यार किया तो क्या डरना"

                                          मत ऐसा तुम व्यव्हार करो,
                                          मैं सांस भी न ले पाता हूँ,
                                          गर इसको कहते जीवन हैं,
                                          तो बतलाओ है क्या मरना?

तब याद करो तुम कहती थी,
कुछ होने न दूंगी तुमको,
"जब रोज़ की ये बीमारी है,
तो होगा ही जो है होना"

                                         सब रस्में प्यार की ख़त्म हुईं,
                                         जीवन से तेरे दूर चला,
                                         न आऊंगा कुछ भी कहने,
                                         कर ले जी चाहे जो करना!

तब मेरे लाए फूलों से,
तुम गालों को सहलाती थी,
गुलदान बना है घर अब तो,
औ' रहा भाग्य में नित झरना!

                                         यह प्रेम कहानी ख़त्म हुई,
                                         कल इसकी अंतिम झाँकी है,
                                         उसकी चौखट पर "शहनाई"
                                         मेरे घर वालों क़ा "रोना" !



Sunday, February 13, 2011

"जीवन क़ा जितना अर्थ हमें ,
 जीवन समझा न पाता है,
 उससे ज्यादा तो मृत्यु क़ा,
 आसार महज़ समझाता है"

"जब तक न ठोकर खाते हम,
तन कर चलते ही जाते हैं,
जब तक है होश नहीं आता,
बस वक़्त गुज़रता जाता है"

"इन अर्थहीन नग़मों से उन,
गीतों की तुलना क्या होगी,
जो सीने में इक छेद लिए,
कोई दीवाना गाता है"

"हम औरों के हित गाते हैं,
पर भले समझ न पाते हैं,
वो तो अपने ही गीतों पर,
टिप-टिप आंसू बरसाता है"

"मृत्यु की शक्ति क्या कहना,
जीवन तो इसकी दासी है,
कल शब्द न जिसको भाते थे,
वो आज गीत लिख जाता है "

"था दोनों हाथ पसारे वह,
पर मिलता था इक बूँद नहीं,
जब ख़त्म हुए गिनती के दिन,
लो प्रेम-सिन्धु लहराता है"

"कल तक तो ऐसा लगता था,
अभी सत्तर बरस बिताने हैं,
पर अब घंटे क्षण में बीतें,
दिन पल-भर में कट जाता है"

"क्या होगा उस बेचारी क़ा,
वो रो-रो के मर जाएगी,
क्यूँ  किया प्यार उससे इतना,
वो सोच-सोच पछताता है"

"जो तेज़ समय से उड़ पाता,
जो बचपन को फिर जी पाता,
न करता प्यार कभी उससे,
नीरस यौवन को पी जाता"

"होनी की जो है प्रबल धार,
उस धार को मोड़ कहीं आता,
जो पथ ऐसे कल को लाता,
उस पथ को छोड़ कहीं आता"

"क्या मरता पंछी देखा है?
उड़ना क्या भूल कभी सकता?
आखों में रखता आसमान,
वह फिर-फिर पंख हिलाता है"

जीवन जीने की जितनी उत्कंठा एक मरते आदमी में होती है...उतनी कभी एक आम आदमी में नहीं हो सकती...
जो प्यार हमे अपने जीवन में नहीं मिलता वो मरते समय ज़रूर मिलता है...हमारा  कलात्मक पक्ष भी बेहद सुदृढ़ हो जाता है...
पर तब तक बहुत देर हो जाती है...दोस्तों मृत्यु से ही जीवन क़ा महत्व है...पर कहीं ऐसा तो नहीं की हमे जीवन को समझने के लिए मरना पड़ेगा...

Saturday, February 12, 2011

आपने अक्सर ऐसा देखा होगा की हम जीवन को जिस दृष्टि से देखते हैं वह समय के साथ बदलता रहता है | आखिर ऐसा क्या है जो एक लड़का यह जानने के बाद की उसे कोई ऐसा मर्ज़ है जिससे वो अब ज्यादा दिनों के लिए नहीं है...और अचानक उसमे कोई दैवी शक्ति आ जाती है और वो ऐसा कुच्छ कर जाता है जो लोग उससे कभी उम्मीद नहीं करते...दोस्तों...जीवन वही है जैसा  हम इसे देखना चाहते हैं...


बस यही है मेरी अगली कविता क़ा विषय...

जल्द ही ले कर आऊंगा...
हिंदी की कविताओं क़ा जन्म श्रोताओं से ज्यादा इसके विषय से जुड़े लोगों  के लिए होता है...ऐसा न हो के हम लोग कविता पढ़ें,इसके भाव और शब्द सौंदर्य की प्रशंसा करें और आगे बढें..यह कविता की हत्या है...और इससे बढ़कर सत्य की हत्या है...आशा है आप लोग भी मेरी दृष्टि से इस कविता को पढेंगे...न सिर्फ पढेंगे अपितु इसे अपने व्यावहारिक जीवन में जीने क़ा प्रयास करेंगे...

अगर ऐसा होता है तो यकीं मानिए मेरी एक कविता कई मधुशालाओं...कई राष्मिरथियों से बढ़कर होगी...

जिस धरती 
पर थे राम हुए ,
हनुमान,कृष्ण,बलराम हुए
हा!अब उस पर बस रावण के,
अवतार दिखाई देते हैं...

अब कहीं नहीं सच्चाई है,
ईमान,धरम क़ा क्या कहना,
मैं जित देखूं तित लालच के
विस्तार दिखाई देते हैं....

आज क़ा एक साधारण मनुष्य क्या सोचता है...????
"है परोपकार में क्या रक्खा,
अपना जीवन secure करो!
क्या हम तुमको बेरोजगार ,
बेकार दिखाई  देते हैं...?"

आप जब बिहार.उत्तर प्रदेश आदि के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में जाएँगे आपको वहां मजदूरों के ठेकेदार मिलेंगे|
उन काम सस्ते दरों पे गरीब लडकों को मुहैया करना होता है...वे लोग तब तक उनसे काम करवाते हैं जब तक वह अधमरा न हो जाए ....आशा है आगे की पंक्तियों क़ा मर्म आप समझ पाएँगे...


"रामू इक गाँव क़ा छोड़ा है,
खाने को घर में थोडा है,
है रक्त-मांस क़ा पता नहीं...!
पर ठाकुर क़ा वह घोडा है..."

"अजी अठरह के लौंडे होकर ,
तुम इतना क्यूँ घबराते हो???
अभी लंगड़ी दौर करने के...
 आसार दिखाई देते हैं..."

"थी बूढी अम्मा सिसक रही,
कूरे के डलिया हाथ लिए,
था चिल्लाता "मालिक! रोटी..."
छोटू बाबा को साथ लिए..

हमारे तरफ अक्सर शादी के पंडालों के पीछे गरीब बच्चे जूठा खाना बटोरने आ जमा होते हैं....उन्ही क़ा चित्र आखों में रखकर कविता पढ़ें...

बिट्टू शामियाने के पीछे,
था कौन खज़ाना ढूंढ रहा,
प्लास्टिक की चट्टी साथ लिए,
टूटे चप्पल को हाथ लिए..

जो लाज बची हो आखों में ,
तो ज़रा इन्हें तुम देख तो लो...
क्या हाथ पैर पाकर भी ये,
लाचार दिखाई देते हैं????

दिल करता है की मैं भी अब ,
इस स्वार्थ जगत में कूद परूँ,
मैं एकाकी इस अन्धकार में ,
कितने अलख जगाऊंगा...???


अंत में आप समाज के कतिपय तथाकथित भावनात्मक लोगों से मैं एक विनती करना चाहूँगा....

आओ साथी अब साथ चलें...
हाथों में डाले हाथ चलें...
जो साथ न आओगे अब तुम ...
मैं कितनी दूर जा पाउँगा...???

"तुम बिन सारे प्रयत्न मुझे ....
निस्सार दिखाई देते हैं...


मैं जित देखूं तित आंसूं  के ही...
धार दिखाई देते है....


मुझे अपनी कविता पर आपकी प्रतिक्रियाओं से ज्यादा आपके एक शालीन प्रयास क़ा इंतज़ार रहेगा...

हल्का-हल्का मुस्काता हूँ...



जब याद वो मुझको आती है,
मेरी बाछें खिल जाती हैं,
आखों में अजब चमक होती,
जब वो यूही मिल जाती है,

उसके ख्याल में मैं अब तो,
ऐसा पागल हो जाता हूँ,
खुद में खोया रहता दिन भर,
हल्का-हल्का मुस्काता हूँ,

जगता हूँ उसके  सपनो से,
उसकी बातों में दिन कटते,
जो शाम को उससे मिल न सकूं,
तो मैं भूका सो जाता हूँ,

डर लगता है उसको कोई,
मेरी आखों में देख न ले,
जब माँ आती,तकिये में मुंह
रखके उल्टा सो जाता हूँ

ऐसा करके मुझे पता नहीं,
अब कैसा सुख मिल जाता है,
तनहा बैठा जब सोच-सोच,
खुद ही में शर्मा जाता हूँ



बच्चन के शब्दों में बोलूं,
तो वह इक शाकिबाला है,
मैं इकलौता पीनेवाला,
यह मन-मंदिर मधुशाला है,
अपनी बातों से वह मदिरा,
जब छलक-छलक छलकाती है,
मैं सुध-बुध खो,सब भूल-भाल,
बस गट-गट पीता जाता हूँ!

मत करना इतना प्यार मुझे

 मत करना इतना प्यार मुझे

 अब तो फिर भी हूँ पास तेरे
 पर कल को किसने देखा है?

                                       तू लाख वरत रख ले पगली
                                       पर होगा वही जो लेखा है!
कौन आया है अमरत्व लिए?

अरी! मृत्यु किसे न आनी है?
                                       तू लाख बना ले बाँध मगर
                                       जीवन तो बहता पानी है!

आ हमदोनो मिलकर  जीवन
के हर पल को ऐसे जी लें!
                                       "मदिरा क़ा क्या कहना साथी
                                       हम पैमाने को भी पी लें"

मृत्यु के बाद सवेरा है|
आने वाला कल तेरा है!
                                       खुशियों क़ा दामन तुम पकड़ो
                                       दुक्खों क़ा आँचल मेरा है|

"जाओ साथी, मैं रह लूँगी
जीवन के कष्ट भी सह लूंगी"
                                        इकबार जो हंसकर तुम कह दो
                                        यह दीपक हो निश्चिन्त बुझे!


मत करना इतना प्यार मुझे!..

मैं भूल गया जीवन क्या है...

जीवन की आपाधापी में ,
मैं भूल गया जीवन क्या है !
उस दीवानी ने भुला दिया ,
"इस दीवाने" का मन क्या है !
                                      

                                     सोचा न समझा , लगा रहा 
                                     पैसा और  नाम कमाने में ,
                                     सोचा था पूछ इन्ही की बस ,
                                     होती है आज ज़माने में !


चेतना शून्य हो जाने क़ा ,
अब और भला लक्षण क्या है ?
जीवन की आपाधापी में ,
मैं भूल गया जीवन क्या है !


                                   है द्वंद्व यूद्ध अब छिड़ा हुआ ,
                                   और पांचजन्य हुंकार रहा ,
                                   इस युद्ध क़ा अश्वत्थामा भी ,
                                   है ग़रज़-ग़रज़ चिंघाड़ रहा ,


डंके की चोट सुन-सुन भूला ,
वो "पायल की छम-छम" क्या है !
वो "लहरों क़ा कलरव" क्या है !
वो "भवरों क़ा गुंजन" क्या है !


                                    इन बातों के हैं क्या कहने ...
                                    ये तो कवियों की थाती हैं ...
                                    मैं तो अब यह भी भूल चूका
                                    हँसना क्या है ! क्रंदन क्या है !


जीवन की आपाधापी में ,
मैं भूल गया जीवन क्या है !
 
                                 जब बैठा-बैठा सोचू मैं ,
                                 कितना सुन्दर था मेरा कल !
                                 झट से तम की चादर ओढ़े ,
                                 छा जाता आने वाला पल ,


इन दोनों 'कल' के बीच कहीं ,
है मेरा जीवन बीत रहा ,
जो सब को चाहा खुश रखना ,
मैं खुद न अपना मीत रहा !
     

                              "जीवन क़ा बीमा " करवाया , 
                               पर भूल गया यौवन क्या है !


जीवन की आपाधापी में ,
मैं भूल गया जीवन क्या है !